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Īśvaradarśanam · Nīlahradālayam

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  1. 9
    पर्वतसम्भ्रमः । दानवसम्भवम् ॥ परस्तात् । निवसन् । चात्यन्तमतुषत् । तत्तीर्थवैलक्षण्यमेतत् । पौराणिकी । साधूनां गौरवं, क्व च नीचमाचरणम् निवासदिवसत्रयावकाशेषु । सः । स्वामिना । कुत्रचिद्विशेषविश्रमेण । गन्तुमिच्छामः । यामिनीद्वयमतिगतम् । सरसमनोहरशैल्या । दृष्टाः । शिश्यिरे । ! निश्चिन्तम् । शनैर्निर्विशेषदशामढौकिष्ट । प्रबुद्धोऽभूत् । सुस्पष्टमध्यक्षितम् । जागरणकारणम् । मस्तकन्यस्तवस्त्रपरिवेष्टितालघुपुस्तकभारश्च । तत्र । प्रलपन् । सम्पादयंश्चावर्तत । लोकोक्तिरासीत् । केचित् । कुशलमप्राक्षीत् । किञ्चित्कालम् । प्रवृत्तः । सम्बभूव । घृणागोचरानापादयन्ति । भ्रंशयन्ति । समासतः । स्वामी । सम्प्राप्तमासीत् । प्रतिदिनमेकवारम् । सुखेनार्दनाटानकलाप्रावीण्यविरहवानपि । कुल्लूराज्यराजधानीमसरद्दिनत्रयमात्रयात्रया । आमोदेन । शिखरवर्त्मनि दृष्टाः । द्वित्रैरहोभिः ।  ॥ ९ ॥