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Īśvaradarśanam · Dārśanikavicintanāni

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    गौरकलेवराः । चात्यन्तमनुरागवन्तस्तत्प्राप्त्युपायानधिगन्तुमैच्छन् । पाश्चात्यपौरस्त्यानाम् । विविक्तदर्शिभिः । दृष्टा । संयुता । – समाधिः । – सम्यग्ग्रहणाय । – शनैर्निरुन्ध्यात् । ग्राह्यम् । कार्या । शक्यम् । किञ्चित्प्रयोजनमस्ति । प्राप्तुमतिदुष्करः । तावत् । सन्तोष्टव्यम् । वेदितव्यः । मोक्षाय । कर्तव्यः । विधेयः । इति । सङ्क्षिप्येत्थमुपदिष्टवान् । नान्यत्किञ्चित् । विचिन्तयामि । यत् । प्रसादधारामुदपादयदमुष्य ।  ॥ २ ॥
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    प्रादायि । रुरुचे । कथितमासीत्तेन । ऐच्छत् । समवर्तत । मुहुर्मुहुर्विहिततत्सत्सङ्गतिः । प्रकाशते । किञ्चित् । पुनरुदयव्यापारादिदर्शनात् । तत्र । नानुमित्यादिरूपम् । स्युरित्यादिः । श्यक्येतेति । शक्यम् । सम्भवि । कुत्रापि । युक्तम् । चावगन्तव्यमिति । सानन्दम् । इति । तद्ग्राह्यमसत्यञ्चोपेक्ष्यम् । कुर्यात् । सर्वदाऽसत्यमेव । सर्वत्र । पिण्डः । विचारनिपुणैर्विद्वद्भिरिति । कदाचिदकिञ्चनसाधुजनश्रद्धातिशयोदयस्योपलक्षणार्थमत्रोदाह्रियते । प्रदर्शितानि । संयोजयिष्यते । १९३७ संवत्सरेष्ववात्सीत् । कृतवान् । तत्र । स्नेहादरपारंम्यम् । निवासमकार्षीत् । च । तत्र । सभ्यदर्शनास्तरुणाः । शक्यते । वक्तव्यमस्ति । प्रधाना । तद्विषयकबहुदीर्घसूत्रिणा । वदामः । तस्य । प्रवृत्तिः । तत्प्राप्तिप्रकारः । गता ।  ॥ ४ ॥