१ ।२ ।३ ।४ ।५ ।६ ।७ ।८ ।९ ।१० ।११ ।१२ ।१३ ।१४ ।१५ ।१६ ।१७ ।१८ ।१९ ।
॥ १ ॥ । । ॥ १ ॥
यं वर्णयितुं साक्षाच्छृतिरपि मूकेव मौनमाचरति ।सोऽस्माकं मनुजानां किं वाचां गोचरो भवति ॥ २ ॥
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। ॥ २१ ॥
Closing attribution
केशावधि नखराग्रादिदमन्तः पूतिगन्धसम्पूर्णम् ।
बहिरपि चागरुचन्दनकर्पूराद्यैर्विलेपयति ॥ २२॥
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। ॥ ५४ ॥
Closing attribution
॥ ४॥ विषयनिग्रहप्रकरणम् ।
संसृतिपारावारे ह्यगाधविषयोदकेन सम्पूर्णे ।
नृशरीरमम्बुतरणं कर्मसमीरैरतस्ततश्चलति ॥ ५५॥
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। ॥ ७४ ॥
अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरुद्धो यथा व्याघ्रः ।बहुनिर्गमप्रयत्नैः श्रान्तस्तिष्ठति पतञ्श्वसंश्च तथा ॥ ७५ ॥
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॥ ६ ॥ । । ॥ ७८ ॥
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॥ ७ ॥ । । ॥ ८६ ॥
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। ॥ १०० ॥
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। ॥ १०४ ॥
माया ब्रह्मोपगताविद्या जीवाश्रया प्रोक्ता ।चिदश्चिद्ग्रन्थिश्चेतस्तदक्षयं ज्ञेयमा मोक्षात् ॥ १०५ ॥
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। ॥ १०९ ॥
॥ ॥लिङ्गदेहादिनिरूपणप्रकरणम् ।स्थूलशरीरस्यान्तर्लिङ्गशरीरं ।कारणमस्याप्यन्तस्ततो महाकारणं ॥ ११० ॥
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॥ १० ॥ । । ॥ ११९ ॥
। ॥ १२० ॥
इत्युपनिषदामुक्तिस्तथा श्रुतिर्भगवदुक्तिश्च ।ज्ञानी त्वात्मैवेयं मतिर्ममेत्यत्र युक्तिरपि ॥ १२१ ॥
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। ॥ १२३ ॥
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॥ ११ ॥ । । ॥ १३३ ॥
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॥ १२ ॥ । । ॥ १३९ ॥
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॥ १३ ॥ । । ॥ १४४ ॥
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। ॥ १५७ ॥
॥ १५ ॥प्रबोधप्रकरणम् ।माधुर्यं ऽणुमात्रेऽपि ।एवं पृथग्भावो गुडत्वमधुरत्वयोरस्ति ॥ १५८ ॥
। ॥ १५९ ॥
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। ॥ १७८ ॥
प्रसादो निन्दायां ।सहिष्णुत्वमापदो ॥ १७९ ॥
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॥ १७ ॥ । । ॥ १८४ ॥
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। ॥ १८५ ॥
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। ॥ १८९ ॥
सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतं ।सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं ॥ १९० ॥
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। ॥ २४२ ॥
। ॥ २४३ ॥
ऽर्पयित्वा मोहमूलोद्भवं मां चिरसमयमुदासीभावं गतासि । सकृदपि वद नेक्षसे त्वं मदीयं न कर्तुं किं ॥ २४४ ॥
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। ॥ २४६ ॥
। ॥ २४७ ॥
। ॥ २४८ ॥
। ॥ २४९ ॥
। ॥ २५० ॥
। ॥ २५१ ॥
। ॥ २५२ ॥
ततोऽन्तरात्मा महामेघः ।खदिरश्चम्पक प्रवर्षणं किं ॥ २५३ ॥
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। ॥ २५७ ॥
Closing attribution
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
प्रबोधसुधाकरः समाप्तः ॥