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किं भवविमुखांभूयिष्ठां लिपिमशक्तो ।शिरस्तद्वैधात्रं न सुवृत्तं कथं निर्यत्नं ॥ १५ ॥
विरिञ्चियु शिर- । ते स्वयमपि ॥ १६ ॥
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च्छा स्फुर-ह्लादो युतो पषुणा चादृतः । सुमनो स साक्षा मनो- धिपो विहरतां ॥ ५१ ॥
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फणिनां नेत्रा -ऽनुग्राहि ति यो । रुचिं नटन्तं रसिकं तं नीलकण्ठं ॥ ५३ ॥
त्ययो -ध्वानो गर्जितं षदां ।भक्तानां विततिर्वृष्टि ज्ज्वलताण्डवं तं नीलकण्ठं ॥ ५४ ॥
पदै नन्द । गणै मायाविने सेयं ॥ ५५ ॥
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संशयो ।ममृत साम्बमीशं य धन्या ॥ ८३ ॥
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