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ज्ज्वल स्फुटंकुर्वाणं वियदिन्द्रनिचयैराच्छादितं ।प्रोल्लस-मृगं द्वीपं ॥ ३ ॥
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स्फूर्जय स्थापितै- कुम्भै ।युक्तं ॥ २१ ॥
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मणिनिकरविराजत्पादुकान्यस्तपादे । ॥ ३८ ॥
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कजातमखिलं भृङ्गारकं करण्डकं चैलाञ्चलं ।विस्फूर्ज भित- परिचारिका ॥ ७६ ॥
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। ॥ ७८ ॥
-शोणीभूतमुदग्र ।दूरादादरपुटैरालोक्यमानं - काञ्चनमातपत्रमतुलं ॥ ७९ ॥
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गणपं विचरदं वटुकं च रुचिं । प्रमथिनीं दुर्गां संपूजय-न्नाग्नेयेऽखिलपरं धिनाथं ॥ ८३ ॥
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दैवतं -भ्युपदेशानुगृहीत ।-मोघत्रयमानतोऽस्मि ॥ ८७ ॥
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संसाधितान्यग्निना । ॥ १०६ ॥
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त्वल्लस-निश्चलविलोचनद्वयीम् ।उन्मनीमुपगतां सभामिमां ॥ ११५ ॥
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विज्ञप्तीरवधेहि मामिह कांदिशीकमधु मातर्न । व्यभिचरेदृ चे- गुणै ॥ १२५ ॥
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