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स्तुत्यं वा होतव्यं नास्ति व्यतिरिक्तमस्य किंचन च ।स्तोत्रादिना स तुष्येन्मुक्तस्तन्निर्नमस्कृतिवषट्कः ॥ ७३ ॥
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