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Stavacintāmaṇi

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    गुणादित्याज्जातो गुणगणगरिष्ठः शिवगुणैः कृतामोदो बाल्यात्प्रभृति गतसंगो जगति यः । स शूरादित्यो मां बहु बहुलभक्त्यार्थयत यत् स्तुतौ तेनाकार्षं विवृतिमिह नारायणकृतौ ॥ १ ॥ श्रीरामेण कृतात्र सद्विवृतिरित्येषा किमर्थेति मा सन्तश्चेतसि कृध्वमस्ति विवृतौ कोऽपि प्रकर्षोऽत्र यत् । तेनार्थिप्रणयाद्दिनैस्त्रिचतुरैर्यां क्षेमराजो व्यधात् क्षेत्रे श्रीविजयेश्वरस्य विमले सैषा शिवाराधनी ॥ २ ॥ शंभोः प्रकाशवपुषः शक्तिरेका जयत्यसौ । या स्फुरन्त्येव तनुते परामृतमयं जगत् ॥ ३ ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीभट्टनारायणविरचितः स्तवचिन्तामणिः समाप्तः । विवृतिश्चात्र तत्रभवत्स्तुतिसूक्तिकारप्रशिष्यमहामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदभिनवगुप्तपादपद्ममधुपराजस्य राजानकक्षेमराजस्य