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Śrīmad Bhāgavatam · The Count of the Principles

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    श्रीभगवानुवाच ।युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा ।मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्
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    श्रीभगवानुवाच ।प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ ।एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः
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    दृग् रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रेपरस्परं सिध्यति यः स्वतः खे ।आत्मा यदेषामपरो य आद्यःस्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ।एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु-र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्
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    श्रीभगवानुवाच ।मनः कर्ममयं नॄणामिन्द्रियैः पञ्चभिर्युतम् ।लोकाल्लोकं प्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते
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