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Śrīmad Bhāgavatam · The Song of the Mendicant

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    श्रीभगवानुवाच ।बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः ।दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः
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    श्रीभगवानुवाच ।इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः ।उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तो भिक्षुरभून्मुनिः
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    श्रीभगवानुवाच ।निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमःप्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम् ।निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा-दकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम्
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