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Īśvaradarśanam · Jñānasādhanaprādhānyam

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  1. 111
    यद्ब्रह्मवेदान्तसिद्धम् ।  ॥ १११ ॥
  2. 112
    स्वानुरूपम् ।  ॥ ११२ ॥
  3. 113
    देवकाङ्क्ष्यम् ।  ॥ ११३ ॥
  4. 114
    श्रेयसोऽन्वेषकेण ।  ॥ ११४ ॥
  5. 115
    योऽधिकारी ।  ॥ ११५ ॥
  6. 116
    कुतोऽभूत् ।  ॥ ११६ ॥
  7. 117
    सर्वम् ।  ॥ ११७ ॥
  8. 118
    स्यात् ।  ॥ ११८ ॥
  9. 119
    चेतनेन ।  ॥ ११९ ॥
  10. 120
    भावी ।  ॥ १२० ॥
  11. 121
    यद्यापद्येताकृतस्योपभोगः ।  ॥ १२१ ॥
  12. 122
    स्वात्मतत्त्वम् ।  ॥ १२२ ॥
  13. 123
    भास्वदप्यात्मतत्त्वम् ।  ॥ १२३ ॥
  14. 124
    ममत्वम् ।  ॥ १२४ ॥
  15. 125
    नुः ।  ॥ १२५ ॥
  16. 126
    कश्चित् ।  ॥ १२६ ॥
  17. 127
    पतित्वा ।  ॥ १२७ ॥
  18. 128
    सम्यगध्यक्षितव्यम् ।  ॥ १२८ ॥
  19. 129
    स्वरूपम् ।  ॥ १२९ ॥
  20. 130
    कोऽस्तीत्यन्तरन्तर्विविच्य ।  ॥ १३० ॥
  21. 131
    चान्यः ।  ॥ १३१ ॥
  22. 132
    विशोद्ध्यम् ।  ॥ १३२ ॥
  23. 133
    सुबोधम् ।  ॥ १३३ ॥
  24. 134
    चित्ते ।  ॥ १३४ ॥
  25. 135
    प्रक्षुभ्यन्त्यामुच्चकैश्चित्तभूम्याम् ।  ॥ १३५ ॥
  26. 136
    ध्रौव्यसम्पत्तिसिद्ध्यै ।  ॥ १३६ ॥
  27. 137
    वश्यवेगैः ।  ॥ १३७ ॥
  28. 138
    कर्तुमर्हेद्विवेकी ।  ॥ १३८ ॥
  29. 139
     ॥ १३९ ॥
  30. 140
    स्यात्कदापि ।  ॥ १४० ॥
  31. 141
    योग्यम् ।  ॥ १४१ ॥
  32. 142
    यद्वत्तथाऽयम् ।  ॥ १४२ ॥
  33. 143
    भोगान् ।  ॥ १४३ ॥
  34. 144
    गीतः ।  ॥ १४४ ॥
  35. 145
    प्राकृतार्थप्रवृत्तौ ।  ॥ १४५ ॥
  36. 146
    पापतापाभिघाति ।  ॥ १४६ ॥
  37. 147
    निहन्यात् ।  ॥ १४७ ॥
  38. 148
    त्वरूपा ।  ॥ १४८ ॥
  39. 149
    साक्षाद्वेदनाभ्यासयोगात् ।  ॥ १४९ ॥
  40. 150
    चेत् ।  ॥ १५० ॥
  41. 151
    निर्विशेषम् ।  ॥ १५१ ॥
  42. 152
    पुण्यापुण्यकृत्क्षुद्रजीवः ।  ॥ १५२ ॥
  43. 153
    तत् ।  ॥ १५३ ॥
  44. 154
    ह्यनन्यादृशम् ।  ॥ १५४ ॥
  45. 155
    शब्दत्वतः ।  ॥ १५५ ॥
  46. 156
    प्राक्तनैः ।  ॥ १५६ ॥
  47. 157
    जयम् ।  ॥ १५७ ॥
  48. 158
    सम्प्राप्यते ।  ॥ १५८ ॥
  49. 159
    यत् ।  ॥ १५९ ॥
  50. 160
    धिग्धिक् ।  ॥ १६० ॥