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Īśvaradarśanam · Vividhaviṣayakopadeśaḥ

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  1. 161
    नराभिमानी ।  ॥ १६१ ॥
  2. 162
    निन्द्यनीचः ।  ॥ १६२ ॥
  3. 163
    तथान्यत् ।  ॥ १६३ ॥
  4. 164
    तादृक्करणैस्त्रिभिश्च ।  ॥ १६४ ॥
  5. 165
    धीरः ।  ॥ १६५ ॥
  6. 166
    हर्षशोकौ ।  ॥ १६६ ॥
  7. 167
    कुरुतामसद्वा ।  ॥ १६७ ॥
  8. 168
    दुष्कर्मकृदप्यवश्यम् ।  ॥ १६८ ॥
  9. 169
    रजताद्रिदेशे ।  ॥ १६९ ॥
  10. 170
    च ।  ॥ १७० ॥
  11. 171
    विरक्तबुद्धेः ।  ॥ १७१ ॥
  12. 172
    शास्त्रादिसम्पन्नमहत्त्वलिङ्गम् ।  ॥ १७२ ॥
  13. 173
    चरतीहयोंऽहः ।  ॥ १७३ ॥
  14. 174
    यावत् ।  ॥ १७४ ॥
  15. 175
    केचिन्मतिमाहुरन्ये ।  ॥ १७५ ॥
  16. 176
    नित्यतुष्टः ।  ॥ १७६ ॥
  17. 177
    दूराद्भ्रमितव्यमारात् ।  ॥ १७७ ॥
  18. 178
    परमार्थमेतत् ।  ॥ १७८ ॥
  19. 179
    बहिर्गतान् ।  ॥ १७९ ॥
  20. 180
    नरोऽयमीष्टे ।  ॥ १८० ॥
  21. 181
    स्त्रिया ।  ॥ १८१ ॥
  22. 182
    ललनाधिकारे ।  ॥ १८२ ॥
  23. 183
    परेषाम् ।  ॥ १८३ ॥
  24. 184
    चेत्युक्तिरमन्दहास्या ।  ॥ १८४ ॥
  25. 185
    स्यात् ।  ॥ १८५ ॥
  26. 186
    कश्चित् ।  ॥ १८६ ॥
  27. 187
    योगी ।  ॥ १८७ ॥
  28. 188
    दरिद्रः ।  ॥ १८८ ॥
  29. 189
    शक्तिपातात् ।  ॥ १८९ ॥
  30. 190
    कार्यात् ।  ॥ १९० ॥
  31. 191
    नूत्नम् ।  ॥ १९१ ॥
  32. 192
    परमात्मवदर्चनीयः ।  ॥ १९२ ॥
  33. 193
    स्यात् ।  ॥ १९३ ॥
  34. 194
    परितोषवित्तः ।  ॥ १९४ ॥
  35. 195
    गोत्रगर्वात् ।  ॥ १९५ ॥
  36. 196
    भूः ।  ॥ १९६ ॥
  37. 197
    स्वतन्त्रः ।  ॥ १९७ ॥
  38. 198
    परात्मबोधः ।  ॥ १९८ ॥
  39. 199
    यथात्मघोषाः ।  ॥ १९९ ॥
  40. 200
    घटादींश्चालयेन्निश्चलश्च ।  ॥ २०० ॥
  41. 201
    लोके ।  ॥ २०१ ॥
  42. 202
    क्षणविवर्तिविनाशिनोऽमी ।  ॥ २०२ ॥
  43. 203
    लाभः ।  ॥ २०३ ॥
  44. 204
    ह्याबालगोपालकम् ।  ॥ २०४ ॥
  45. 205
    लोके ।  ॥ २०५ ॥
  46. Closing attribution

    इति द्वितीयः खण्डः ॥ इति श्रीस्वामितपोवनविरचितमीश्वरदर्शनमथवा तपोवनचरितं समाप्तम् ॥ ॐ